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.एक दिन विभाजन विभीषिका स्मृति के नाम , इं.गां.रा.ज.विश्वविद्यालय अमरकंटक में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

इतिहास विभाग ने भारत सरकार के आह्वान पर विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी और प्रदर्शनी का आयोजन, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक में किया। इस संगोष्ठी और प्रदर्शनी को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ने प्रायोजित किया। इसके उद्घाटन सत्र में डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (मध्य प्रदेश) के कुलाधिपति, प्रो. बलवंत शांतिलाल जानी, मुख्य अतिथि; जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा (बिहार) के सामाजिक विज्ञान संकाय के पूर्व संकायाध्यक्ष प्रो. सरोज कुमार वर्मा, विशिष्ट अतिथि; विश्वविद्यालय के लुप्तप्राय भाषा केंद्र के पूर्व निदेशक, प्रो. दिलीप सिंह, संगोष्ठी के मुख्य वक्ता और विश्विद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी अध्यक्ष के रूप में मौजूद रहे और अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए।

इस संगोष्ठी के संयोजक डॉ. अमित कुमार रवि ने प्रो. लक्ष्मण हावनूर सभागार में उपस्थित सभा को इस आयोजन के औचित्य से अवगत कराते हुए बताया की 2021 में माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 14 अगस्त को हर वर्ष विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के तौर पर मानने की घोषणा की है। डॉ. रवि ने कहा कि विभाजन की ख़ुशी के साथ ही देश को विभाजन का दुःख भी झेलना पड़ा। इस त्रासदी की चपेट में हर उम्र के लोग आए, उनके संघर्षों और बलिदान को याद करने और उनके सम्मान में ये दिन मनाया जा रहा है। वर्तमान में समाज में जो मतभेद और वैमनस्य है, उसको ख़त्म करने की दिशा में भारत सरकार ने देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस की मानने पहल की है। क्षेत्रीय इतिहास के महत्व पर ज़ोर देते हुए, उन्होंने कहा कि कि इतिहास के दृष्टिकोण से सबसे महत्वपूर्ण ‘क्षेत्र’ और ‘लोग’ होते हैं और इस भयावह घटना जिसमें सबसे ज़्यादा आम इंसान प्रभावित हुआ था, उसे याद करने की ज़रूरत है।

इस संगोष्ठी के मुख्य वक्ता, प्रो. दिलीप सिंह ने विभाजन को रोंगटे खड़े करने वाली अविस्मरणीय घटना बताते हुए कहा की यह घटना भारतीय जन मानस को सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली थी।यह इतिहास की मात्र एक निर्जीव घटना नहीं बल्कि मानवता को नष्ट करने वाले स्वर इसमें सुनायी दिए। देश के प्रख्यात भाषाविद् प्रो. सिंह ने यह बताते हुए कि इस विषय पर ज़्यादातर भुक्तभोगियों ने ही लिखा है, उन्होंने विभाजन पर लिखे गये प्रासंगिक साहित्य और सिनेमा का उल्लेख व वर्णन किया। लोहिया की ‘भारत विभाजन के गुनहगार’, अम्बेडकर की ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’, 1940 में लिखा और 1940 में मंचित नाटक ‘दीवार’ और ‘पठान’, एलन कैम्पबेल जॉनसन की ‘भारत विभाजन की कहानी’, यशपाल की लिखा उपन्यास ‘झूठा सच’, भीष्म साहनी की ‘तमस’ और लघु कथा ‘अमृतसर आ गया है’, मंटो की मशहूर रचना ‘टोबा टेक सिंह’ और ‘खोल दो’ कृष्णा सोबति की कहानी ‘सिक्का बदल गया’, इस्मत चुग़ताई की ‘टेढ़ी लकीर’, अज्ञेय की कविता ‘शरणार्थी’ जैसी कृतियों की विषयवस्तु पर उन्होंने विस्तार से प्रकाश डाला। फ़िल्मों में 1949 में प्रदर्शित ‘लाहौर’, 1974 की बहुचर्चित ‘गर्म हवा’, 1988 में आयी तमस। साथ ही असग़र वजाहत की ‘जिस लाहौर नइ देख्या, ओ जम्याइ नइ’ और अमृता प्रीतम की ‘पिंजर’ का भी विवरण दिया। प्रो. सिंह ने कहा कि विभाजन से जुड़े साहित्य व फ़िल्मों को देखना-पढ़ना इसलिए भी अहम है की हमें हमारा इतिहास याद रहे और मनुष्य-मनुष्य के बीच अच्छा सम्बन्ध बना रहे।सत्र के विशिष्ट अतिथि, प्रो. सरोज कुमार वर्मा ने युवाओं को विभाजन के विषय में अध्ययन करने के लिए प्रेरित करते हुए कहा की भविष्य में ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो इसलिए आप सब का जागरूक होना आवश्यक है। दुनिया में हमारी पहचान सबसे बड़े लोकतंत्र की है। दुष्यंत कुमार की कविता ‘ये सूरत बदलनी चाहिए’ की कुछ पंक्तियों का पाठ करते हुए उन्होंने समापन टिप्पणी की देशप्रेम की आग हम सब के अंदर जलनी चाहिए का स्वर बुलंद किया।

मुख्य अतिथि, प्रो. बलवंत शांतिलाल जानी, ने सभा को सम्बोधित करते हुआ कहा कि हम भूल गये ऐसा नहीं है, हमें सब सब याद है और आज का दिन, ऋणभाव प्रकट करने का अवसर है। उन्होंने शोध की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। विभाजन की प्रक्रिया और प्रतिक्रिया क्यूँ है इन बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की साथ ही माउंटबेटन की भूमिका से भी अवगत कराया। प्रो. जानी ने आगे जोड़ा कि विभाजन के दौरान हमने कुछ पाया नहीं, सब कुछ खोया। उन्होंने इस महत्वपूर्ण आयोजन की सराहना करते हुए इतिहास विभाग और विश्वविद्यालय को बधाई प्रेषित की। इस मौक़े पर विश्वविद्यालय के कुलपति ने मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी, विभाजन की वेदना के स्वर को हमें सुनने का मौक़ा देने कि लिए प्रधान मंत्री का आभार प्रकट किया।उन्होंने कहा कि गिद्ध मुर्दाख़ोर होता है पर विभाजन काल में इंसान के भेष में बैठे गिद्धों ने जीवित लोगों पर प्रहार किया और बस-ट्रेन लाशों से भर दिए, महिलाओं के साथ अत्याचार किया, पर हम पुनः आरोहण करेंगे, हम ध्वजारोहण करेंगे। हमारा लक्ष्य महानतम शक्ति बनना है। सकारात्मकता से पूर्ण अपने भाषण में उन्होंने कहा कि हम ऐसी उपलब्धियाँ हासिल करें कि ये दर्द पीछे छूट जाए, हमारा झंडा हमेशा ऊँचा रहे और अतीत की गलती भविष्य में ना दोहरायी जाए। इस अवसर पर सामाजिक विज्ञान संकाय की संकायाध्यक्ष प्रो. रंजू हासिनी साहू ने स्वागत भाषण और इतिहास विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ देवेंद्र कुमार सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। मंच संचालन, विभाग की शोध छात्रा, सुश्री पूजा दाहिया ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत में विभाजन की त्रासदी से प्रभावित लोगों के संघर्ष और बलिदान की स्मृति में दो मिनट का मौन रखा गया। राष्ट्रीय संगोष्ठी के साथ ही विभाग ने भारत विभाजन विषय पर पोस्टर और रंगोली बनाने की प्रतियोगिताएँ भी आयोजित की जिसका पुरस्कार वितरण उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि ने किया। प्रदर्शनी में मंत्रालय से भेजे गये तस्वीरों के साथ प्रतिभागियों के बनाए गये पोस्टर को भी सम्मलित किया गया। दूसरे सत्र में देश के अनेक हिस्सों से आए अध्यापकों और शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र पढ़े जिसकी अध्यक्षता, मानविकी एवं भाषा संकाय की संकायाध्यक्ष, प्रो. अभिलाषा सिंह ने की और उपाध्यक्ष अर्थशास्त्र विभाग के डॉ विनोद सेन रहे। समापन सत्र के मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय के अधिष्ठता, अकादमिक, प्रो. आलोक श्रोत्रिय मौजूद रहे

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